संस्था का उद्देश्य
क- संस्कृत वाॅग्मय का प्रचार, पठन-पाठन और संस्कृत भाषा के उन्नयन एवं उन्नति के लिए प्रयास करना व प्राचीन भारतीय संस्कृत भाषा का प्रचार व प्रसार करना।
ख- संस्कृत प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय एवं महाविद्यालय चलाना, विद्यार्थियों को प्रोत्साहित कर उनको वि़द्यालय में प्रवेश देना, उनको प्रशिक्षित करना तथा प्राथमिक एवं प्रथमा से उत्तर मध्यमा तक व शास्त्री से आचार्य पर्यन्त परीक्षाओं हेतु अध्यापन द्वारा उन्हें परीक्षा के लिए तैयार करना, परीक्षा दिलाना और उत्तीर्ण छात्रों को प्रमाण-पत्र/उपाधि दिलाना।
ग- पुस्तकालय एवं छात्रावास इस संस्था के अध्यापकों व छात्रों के लिए स्थापित करना, उसकी समुन्नति करना एवं योग्य विद्यार्थियोें को छात्रवृत्ति देना एवं छात्रवृत्ति हेतु अर्थ-व्यवस्था सुनिश्चित करना।
घ- संस्कृत प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय एवं महाविद्यालय के संचालन हेतु राजकीय सहायता प्राप्त करना और उससे केवल संस्था के व्यय का प्रबन्ध करना एवं सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी व उत्तर प्रदेश माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद्, लखनऊ से सम्बन्ध स्थापित कर उत्तीर्ण छात्रों को प्रमाण-पत्र/उपाधि दिलाना।
ड - महाविद्यालय व माध्यमिक विद्यालय के पुस्तकालय में पुस्तकों का संग्रह करना तथा विद्यार्थियों को पुस्तकों के पठन-पाठन की सुविधा उपलब्ध कराना और पुस्तकालय की उचित व्यवस्था करके उसे संचालित रखना। प्राच्य भाषा की अनेक प्राचीन व दुर्लभ ग्रन्थों का संग्रह कर उन्हें पुस्तकालय में सुरक्षित रखना।
च- महाविद्यालय का वार्षिक समारोह करना एवं उसकी प्रगति सफलता व विशेषताओं का प्रचार करना एवं समारोह में अभ्यागत विद्वानों का उचित समादर करना।
छ- महाविद्यालय के संचालन के लिए छात्रावास, पाठशाला, पुस्तकालय व वाचनालय आदि हेतु भवन की उचित व्यवस्था करना व उसके मरम्मत व सफाई की व्यवस्था करना तथा विद्यालय भवन में अन्य महाविद्यालय के छात्रों के साथ प्रतियोगिताओं की व्यवस्था करना व महाविद्यालय के विद्यार्थियों को तैयार कर प्रतियोगिताओं में अन्यत्र भी भेजने के लिए प्रेरित कर उन्हें तैयार करना, विद्यार्थियोें के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए प्राणयाम, योग एवं अध्यात्म, व्यायाम व खेलकूद की उचित व्यवस्था करना।
ज- भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत भाषा की सुरक्षा एवं संरक्षण में योगदान करना व समय समय पर संस्कृत के विद्वानों का शास्त्रार्थ आयोजित करना, शास्त्रार्थ हेतु अध्यापकों व विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना एवं समय-समय पर विद्वानों की संगोष्ठी, शास्त्रार्थ चर्चा करना व उनका सम्मान करना।
झ- महाविधालय के विस्तार एवं शैक्षणिक उन्नयन हेतु चल व अचल सम्पत्ति का निर्माण करना। प्राच्य संस्कृत भाषा के विभिन्न भागो, संस्कृत साहित्य, ज्योतिष एवं खगोल, पुरोहित एवं कर्मकांड, नव्याव्याकरण, वेद-वेदांग, योग एवं अध्यात्म तथा अनेक महत्वपूर्ण प्राच्य भारतीय परंपरा में सनहित सांस्कृतिक विरासत के रूप में विधमान अनेक भाषाओं के साथ आधुनिक विषय ज्ञान-विज्ञान कि भी शिक्षा व्यवस्था करना तथा लुप्तप्राय भारतीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित एवं सुरक्षित रखने का प्रयास करना |
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