प्राचार्य का सन्देश

हम सब मिलकर संस्कृत भाषा को आगे बढ़ाये जो भारत के निर्माण में सदैव सहायक सिद्ध हुई है । अतीत की धरोहर जो अपनी विलक्षण क्षमता के कारण हजारो लाखो वर्षो के पश्चात भी अपने अस्तित्व को आधुनिक समय मे भी बचाये हुए है । संस्कृत भाषा से ही संस्कृति और संस्कार बनते है, जो भारत की मूल धरोहर है । आज संस्कारो को पुनः जीवित एवं पोषित करने की आवश्यकता है जिससे की ये अपने प्राचीन शिखर पर पहुंच सके ।

वैसे तो प्रत्येक भाषा विचारो का आदान प्रदान का माध्यम कही जाती है, संस्कृत भाषा जिसे देववाणी भी कहा जाता है । जो आत्मिक शांति एवं आनंद इस भाषा को बोलने और सुनने से प्राप्त होता है । वो आत्मिक शांति एवं आनंद संस्कृत भाषा के अतिरिक्त किसी भी भाषा के बोलने और सुनने से प्राप्त नहीं होता है । संस्कृत कोई ऐसा विषय नहीं है जिसे किसी परिसीमा में बांधा जा सके बल्कि एक पवित्र विचारधारा है, जिसके माध्यम से प्राचीन समय मे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एकता के सूत्र में बाधा हुआ था ।

" वसुधैव कुटुंबकम " जैसी कल्याणकारी विचारधारा को पुनः प्रचारित करने एवं उसके कल्याण के लिये यदि हम कुछ कर सके तो यह एक पुण्य कर्म होगा, जिससे मानव जीवन को उसके लक्ष्य की प्राप्ति हो जायगी ।

संस्कृत प्राचीन भाषा है जिसके गर्भ से समस्त भाषाओ का उदगम हुआ आज वही भाषा तड़फती सी प्रतीत हो रही है। इस तड़फ को और अधिक तड़फ़ने के लिए न छोड़े । अब समय आ गया है की हम सब मिलकर मोक्ष प्रदान करने वाली संस्कृत भाषा को उसकी प्राचीन ख्याति प्रदान करे और इस महान यज्ञ में अपने निःस्वार्थ कर्म की आहुति दे।

 

श्री आलोक कुमार मिश्रा
प्राचार्य

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